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लॉकडाउन से देश की भयावह तस्वीर आई सामने..... बुजुर्गों को याद आया विभाजन तो युवकों को याद आया गांव.
May 11, 2020 • MAHESH MAWLE (EDITOR) 9407505550 • राष्ट्रीय

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मुम्बई । रोज कमाकर अपना पेट भरने वाले ऐसे लाखों मजदूरों के सड़कों पर निकलने की तस्वीरें सामने आने के बाद राज्य सरकारें हरकत में आईं और लॉकडाउन  के बाद इन प्रवासी मजदूरों की सुविधा के लिए खाने-पीने की व्यवस्था करने के आदेश दिए। जबकि केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के  दिन सभी राज्य सरकारों को इन मजदूरों के लिए जरूरी कदम उठाने की अपील की थी। ऐसे में सवाल यह है कि रोज कमाकर अपना पेट भरने वाले ऐसे लाखों मजदूरों के सड़कों पर निकलने की तस्वीरें सामने आने के बाद राज्य सरकारें हरकत में आईं और लॉकडाउन के दो दिन के बाद इन प्रवासी मजदूरों की सुविधा के लिए खाने-पीने की व्यवस्था करने के आदेश दिए। जबकि केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के चौथे दिन सभी राज्य सरकारों को इन मजदूरों के लिए जरूरी कदम उठाने की अपील की। ऐसे में सवाल यह है कि लॉकडाउन से पहले आखिर क्यों सरकार ने इन गरीबों के बारे में नहीं सोचा?
"हम मजदूरों की क्या गलती थी, हमें इतना समय भी नहीं दिया गया कि हम बस या ट्रेन से अपने घर पहुँच सकें। हम मजदूरों के बारे में तो सोचना चाहिए था, तीन दिनों बाद जैसे-तैसे लखनऊ पहुंचे हैं, अम्बेडकरनगर जाना है, बस पैदल चले जा रहे हैं, न जाने कब पहुंचेंगे, बहुत बुरी हालत है," लखनऊ के चारबाग बस अड्डे में बस मिलने की उम्मीद से पहुंचे सूरज कुमार बताते हैं। सूरज दिल्ली में एक टाइल्स के कारखाने में मजदूरी करते थे। आज देश का मजदूर मुम्बई सहित देश के महानगरों से कोसों दूर तक का सफर पैदल चलने को मजबूर नज़र आ रहा है । जिसके चलते देश मे कई बडे हादसे भी हुए क्या उसके बाद भी सरकार जाग उठी है .... दर्द भरी दास्तान..... 
"हम मजदूरों की क्या गलती थी, हमें इतना समय भी नहीं दिया गया कि हम बस या ट्रेन से अपने घर पहुँच सकें। हम मजदूरों के बारे में तो सोचना चाहिए था, सात  दिनों बाद जैसे-तैसे हरदा पहुंचे हैं, लखनऊ जाना है, बस पैदल चले जा रहे हैं, न जाने कब पहुंचेंगे, बहुत बुरी हालत है," मुम्बई के अंधैरी बस स्टेशन पर  बस मिलने की उम्मीद से पहुंचे आबिद खान बताते हैं कि वह एक टाइल्स के कारखाने में मजदूरी करते थे।
हरदा से मुईन अख्तर खान